रायपुर/ छत्तीसगढ़
हाल ही में नवीन जिंदल द्वारा दिए गए बयान, जिसमें उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या PSU में हादसा होने पर Chairman पर FIR की जाती है, बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और भ्रामक है। यह बयान न केवल कानून की समझ की कमी दर्शाता है, बल्कि औद्योगिक दुर्घटनाओं में वास्तविक जिम्मेदारी से ध्यान भटकाने का प्रयास भी है।
सवाल यह है कि जब मुनाफा होता है, तो उद्योगपति कहते हैं — “हम मालिक हैं, हमारा vision, हमारा effort, हमारा investment।”
लेकिन जैसे ही हादसा होता है, जिम्मेदारी अचानक Contractor, Supervisor और Engineer पर डाल दी जाती है। यह दोहरा रवैया अब स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उत्पादन बढ़ाने की अंधी दौड़ में कई उद्योग प्रबंधन सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हैं। फैक्ट्री इंस्पेक्टर और बॉयलर इंस्पेक्टर जैसे तंत्र को प्रभावित कर लाइसेंस और प्रमाणपत्र हासिल किए जाते हैं। ठेकेदारों पर दबाव बनाकर मजदूरों से असुरक्षित परिस्थितियों में काम कराया जाता है। और जब दुर्घटना होती है, तो बड़े पदों पर बैठे लोग खुद को बचाने में लग जाते हैं।
कारखाना अधिनियम, 1948 स्पष्ट रूप से “Occupier” यानी कारखाने के वास्तविक नियंत्रणकर्ता की जिम्मेदारी तय करता है। ऐसे में यह कहना कि Chairman या शीर्ष प्रबंधन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती, पूरी तरह गलत और कानून के विपरीत है।
क्या उत्पादन क्षमता बढ़ाने का निर्णय कोई Contractor लेता है? या यह कंपनी के बोर्ड और उच्च प्रबंधन द्वारा तय किया जाता है? जवाब सबको पता है।
नियम और कानून सबके लिए समान हैं — चाहे PSU हो या Private। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा उद्योगपति क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।
हम स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं:
औद्योगिक हादसों में जिम्मेदारी तय होगी, और शीर्ष स्तर तक तय होगी।
भ्रामक बयान देकर जनता को गुमराह करने की कोशिश बंद होनी चाहिए।
पीड़ित श्रमिकों और उनके परिवारों को न्याय मिलना ही चाहिए।
श्रमिकों की जान सस्ती नहीं है — जवाबदेही तय होकर रहेगी।
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