निजी संस्था के एक फैसले से बदल गई थी वैवाहिक स्थिति, हाईकोर्ट ने बताया आखिर किसका आदेश मान्य होगा

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बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकार से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि कोई निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून के तहत स्थापित न्यायालय का दर्जा हासिल नहीं कर सकता। ऐसी संस्था किसी महिला के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण करने या विवाह विच्छेद की कानूनी घोषणा करने का अधिकार नहीं रखती।जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने रायपुर स्थित इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से 18 जनवरी 2022 को जारी आदेश को कानूनी अधिकार से रहित माना। इस आदेश में याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था।

किसी निजी आदेश से विवाह खत्म नहीं हो सकता

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इदारा-ए-शरिया की ओर से जारी आदेश किसी वैधानिक न्यायिक प्रक्रिया के तहत पारित नहीं हुआ था। इसलिए उसके आधार पर न तो विवाह समाप्त माना जा सकता है और न ही किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति, अधिकार या दायित्व में बदलाव किया जा सकता है।कोर्ट की यह टिप्पणी वैवाहिक विवादों में निजी धार्मिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने साफ कर दिया कि कानूनी रूप से प्रभावी निर्णय वही होगा, जिसे वैधानिक व्यवस्था के तहत अधिकार प्राप्त न्यायिक संस्था जारी करे।

दूसरी शादी के बाद शुरू हुआ था पारिवारिक विवाद

मामला रायपुर के टिकरापारा निवासी निरोश अब्बासी से जुड़ा है। उनके पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से दूसरी शादी की।शादी के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर पति और पत्नी के बीच विवाद की स्थिति बनने लगी। महिला के अनुसार, इसी विवाद के बाद उन्हें तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की गई।इसी घटनाक्रम के दौरान इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से वर्ष 2022 में आदेश जारी किया गया, जिसमें महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर अदालत ने इस आदेश की कानूनी वैधता पर विचार किया और स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक संस्था के ऐसे आदेश से किसी व्यक्ति की वैवाहिक या कानूनी स्थिति स्वतः नहीं बदल सकती।

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