राजेश राठौर
दैनिक दर्पण न्यूज़
जांजगीर-चांपा। खेतों में धान कटने के बाद बचा पैरा अक्सर किसानों के लिए बेकार समझा जाता है। कई जगह इसे जला दिया जाता है, जिससे प्रदूषण भी फैलता है। लेकिन अब यही पैरा जिले के युवाओं और महिलाओं की जिंदगी बदलने का जरिया बन सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र में शुरू हुए तीन दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण ने यह उम्मीद जगाई है कि बेकार समझी जाने वाली चीज भी रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिले के अलग-अलग गांवों से पहुंचे 40 किसान और स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया। यहां उन्हें मशरूम उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक, बीज तैयार करने, रखरखाव, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंचने के तरीके सिखाए जा रहे हैं। आधुनिक तकनीकों के साथ प्रायोगिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि सीख सीधे रोजगार में बदल सके।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पुलिस अधीक्षक विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि जांजगीर-चांपा जैसे कृषि प्रधान जिले में पैरा से व्यवसायिक मशरूम उत्पादन युवाओं और महिलाओं के लिए आय का नया स्रोत बन सकता है। उन्होंने कहा कि कम लागत में शुरू होने वाला यह व्यवसाय ग्रामीण परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करेगा।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के.डी. महंत ने बताया कि मशरूम केवल आय का साधन ही नहीं, बल्कि पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर खाद्य पदार्थ भी है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को सफल महिला मशरूम उत्पादक सविता पटेल के प्रक्षेत्र का भ्रमण कराया गया, जहां उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सही तकनीक अपनाकर गांव में रहकर भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
प्रशिक्षण में शामिल प्रतिभागी सुनीता के चेहरे पर भी नई उम्मीद साफ दिखाई दी। उनका कहना था कि यदि गांव की महिलाएं इस तकनीक को अपनाएं तो उन्हें रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा। घर के साथ-साथ स्वरोजगार भी आसानी से किया जा सकता है।
यह पहल सिर्फ मशरूम उगाने की नहीं, बल्कि गांवों में आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण और युवाओं के लिए नए अवसर उगाने की शुरुआत है। जिस पैरा को कल तक किसान बोझ मानते थे, वही अब उनके सपनों की फसल बन सकता है।

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