*अचानकमार में अफसरशाही का ‘डबल अटैक’: 10 लाख की सड़क पर DFO का ताला, राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्र’ बैगा बूंद-बूंद को तरसे*

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आर एस न्यूज एजेंसी जांजगीर चांपा ।


लोरमी-मुंगेली।जांजगीर अचानकमार के ग्रामीणों के विकास के सपने पर DFO ने 24 घंटे में ही ‘बुलडोजर’ चला दिया। 12 साल पहले वन ग्राम की ‘गुलामी’ से आजाद होकर राजस्व ग्राम बना अचानकमार फिर ‘अफसरशाही की जंजीर’ में जकड़ गया। 21 अप्रैल को जनपद पंचायत लोरमी के CEO द्वारा जारी आदेश क्रमांक-57 के तहत विधायक मद से 10 लाख की लागत से दो सड़कों का निर्माण स्वीकृत हुआ। पहली सड़क विजय किराना दुकान से पंचायत भवन तक, दूसरी गोदाम से अस्पताल तक। आदेश की प्रतिलिपि PMO से लेकर ग्राम पंचायत सचिव तक भेजी गई। 22 अप्रैल को ग्राम पंचायत में ट्रक भर-भरकर सीमेंट, गिट्टी, रेत गिराई गई। मजदूरों ने नारियल फोड़कर, ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ फावड़ा उठाया ही था कि DFO मुंगेली का आदेश क्रमांक-294 ‘ब्रह्मास्त्र’ बनकर आ गिरा। DFO ने काम तत्काल बंद कराते हुए State Board for Wildlife की अनुमति अनिवार्य बता दी। ग्रामीणों का आरोप है कि जनपद के आदेश में ‘लाल स्याही’ से स्पष्ट लिखा है कि निर्माण कार्य केवल राजस्व भूमि पर होगा, फिर भी ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ का हवाला देकर काम रोका गया। अब लाखों का निर्माण सामग्री पंचायत प्रांगण में खुले आसमान के नीचे पड़ी है। ग्रामीण पूछ रहे हैं- ‘साहब, जब रोकना ही था तो सामग्री गिराने से पहले क्यों नहीं बताया? बारिश में सीमेंट की ‘खीर’ बन गई तो भरपाई कौन करेगा?’ विवाद की असली जड़ 13 जनवरी 2014 का कलेक्टर आदेश क्रमांक-262 है। इस आदेश से अचानकमार की 60.300 हेक्टेयर भूमि को वन ग्राम से पृथक कर राजस्व ग्राम घोषित किया गया था। यानी यहां विकास कार्य वन विभाग की अनुमति के बिना हो सकते हैं। इसके बावजूद DFO ने खुद को ‘सुपर कलेक्टर’ बताते हुए कलेक्टर के आदेश को दरकिनार कर दिया। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि DFO को अचानकमार की मिट्टी से नहीं, ‘यहां के वोट’ से दिक्कत है। सड़क विवाद के बीच अचानकमार की बैगा बस्ती में ‘कर्बला’ जैसे हालात हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जिन्हें ‘दत्तक पुत्र’ कहकर संबोधित करती हैं, वो विशेष पिछड़ी जनजाति के बैगा परिवार 45 डिग्री तापमान में प्यास से बिलख रहे हैं। गांव का इकलौता बोरवेल एक महीने से खराब है। मोटर जल गई, पाइपलाइन चोक है। महिलाएं और बच्चे रोज 2 किलोमीटर दूर दूसरे गांव से सिर पर मटका रखकर पानी लाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने बताया कि बीते एक महीने में दर्जनों बार PHE विभाग को लिखित-आवेदन दिया गया। सरपंच से लेकर जनपद सदस्य तक विभाग के चक्कर काट चुके। हर बार बाबुओं का एक ही जवाब- ‘आपकी फाइल प्रोसेस में है’। ग्रामीणों का दर्द है- ‘प्रोसेस में फाइल नहीं, हमारे बच्चों की जान जा रही है। विशेष पिछड़ी जनजाति मद का पैसा आखिर जाता कहां है?’ अब अचानकमार का सब्र टूट चुका है। ग्रामीणों ने पंचायत में बैठक कर जिला प्रशासन को 7 दिन का अल्टीमेटम दिया है। मांग दो टूक है- 1. 10 लाख की स्वीकृत सड़क का निर्माण तत्काल शुरू हो, 2. बैगा बस्ती के बोर में 72 घंटे के अंदर नई मोटर लगाई जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि 7 दिन में मांगें पूरी नहीं हुईं तो हजारों ग्रामीण DFO कार्यालय का घेराव करेंगे और कलेक्टर कार्यालय के सामने खाली मटके फोड़कर जल सत्याग्रह करेंगे। अब पूरा जिला देख रहा है कि प्रशासन DFO की ‘तानाशाही’ पर लगाम कसता है या अचानकमार को ‘भगवान भरोसे’ छोड़ देता है। अगर खुले में पड़ा सीमेंट पत्थर बन गया और पानी के अभाव में किसी बैगा की जान गई, तो इस ‘पाप’ का जिम्मेदार कौन होगा? कलेक्टर और DFO को जवाब देना ही पड़ेगा।


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