मैकल के पहाड़ निगल रहा माफिया...।
जीपीएम/अमरकंटक | जांजगीर-चांपा ।
विशेष रिपोर्ट
रिपोर्टर राकेश कुमार साहू जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़ राज्य।
जब सत्ता मौन साध ले और कानून केवल फाइलों में सिमट जाए, तब माफिया के हौसले पहाड़ों से ऊँचे हो जाते हैं। छत्तीसगढ़–मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित पवित्र अमरकंटक–मैकल बायोस्फियर रिजर्व आज हरियाली, नदियों और आस्था के लिए नहीं, बल्कि खनन माफिया के खौफनाक आतंक के लिए पहचाना जा रहा है। ताज़ा घटना ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला कर दिया है। पत्रकार सुशांत गौतम को अवैध उत्खनन की सच्चाई उजागर करने की कीमत लोहे की रॉड, लहू और मौत की धमकी से चुकानी पड़ी।
वरिष्ठ पत्रकारों की चेतावनी: क्या शहादत ही एकमात्र रास्ता है?
वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेंद्र का सवाल सिस्टम के मुँह पर तमाचा है— “क्या हर बार किसी पत्रकार को शहीद होना पड़ेगा, तभी सरकार जागेगी? क्या छत्तीसगढ़ में माफियाओं को खुली छूट देना अब परंपरा बन चुकी है?”
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि प्रदेश में “मग्गू सेठ” जैसे चेहरे खुलेआम घूम रहे हैं और जो पत्रकार उनके चेहरे से नकाब हटाने की कोशिश करता है, उसके अस्तित्व पर हमला होना तय है। यह स्थिति केवल पत्रकारों की नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार पर हमला है।
वारदात...
जब कैमरे को चुप कराने उतरा माफिया
8 जनवरी, शाम लगभग 6 बजे। सुशांत गौतम अपनी टीम के साथ मैकल पर्वत श्रृंखला में हो रहे अवैध उत्खनन की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर लौट रहे थे। तभी धनौली क्षेत्र में माफिया ने फिल्मी अंदाज़ में घेराबंदी कर दी—
सामने सफेद कार, एक ओर भीमकाय हाईवा,
पीछे से तीसरी गाड़ी। पलभर में सड़क जंग का मैदान बन गई।
इसके बाद जो हुआ, वह किसी अपराध फिल्म से कम नहीं था...
लोहे की रॉड से हमला, गाड़ियों के शीशे टूटे, पत्रकार का चेहरा लहूलुहान कर दिया गया। साक्ष्य मिटाने के इरादे से मोबाइल फोन भी लूट लिया गया। यह हमला किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस कैमरे और कलम पर था, जो माफिया की अवैध तिजोरियों का राज खोल रहा था।
अपराध के चेहरे: नामजद, फिर भी बेखौफ...
इस मामले में FIR क्रमांक 0014/2026 दर्ज है।
नाम सामने हैं—
जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू)
सुधीर बाली
लल्लन तिवारी
भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएँ—126(2), 296, 115(2), 351(3), 324(4), 304, 3(5)—यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यह हमला पूर्व नियोजित और संगठित अपराध था। लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या रसूखदार आरोपियों तक कानून का हाथ पहुँचेगा, या FIR भी बाकी मामलों की तरह धूल खाती रहेगी?
प्रशासनिक चुप्पी: मजबूरी या मिलीभगत?
मरवाही वनमंडल की रिपोर्ट साफ कहती है कि पमरा क्षेत्र में क्रेशर माफिया ने नियमों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं— 250 मीटर की अनिवार्य दूरी का खुला उल्लंघन बायोस्फियर रिजर्व में भारी मशीनें
डायनामाइट धमाकों से पहाड़ों का सीना छलनी
यह सब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद हो रहा है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं...
वन विभाग की चेतावनी के बाद भी अनूपपुर खनिज विभाग ने उत्खनन क्यों नहीं रोका?
क्या इस माफिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?
क्या अमरकंटक में प्रशासन केवल दर्शक बन चुका है?
पत्रकार का संकल्प: “कलम झुकेगी नहीं”
जानलेवा हमले के बावजूद सुशांत गौतम का बयान व्यवस्था के लिए चुनौती है— “यह हमला उनकी बौखलाहट है। वे सच से डरते हैं। झूठे केस, धमकियाँ—सब आज़मा रहे हैं, लेकिन मैकल की बर्बादी का सच अब दबेगा नहीं।” यह बयान साबित करता है कि पत्रकार भले घायल हो, पर पत्रकारिता अभी ज़िंदा है।
अब आर-पार की लड़ाई...
मैकल पर्वत केवल पत्थर नहीं, यह नर्मदा, सोन और जोहिला जैसी नदियों की जन्मस्थली है,
यह करोड़ों लोगों की आस्था और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। आज यदि एक पत्रकार को सच दिखाने पर सड़क पर घेरकर पीटा जा सकता है, तो कल कोई भी आम नागरिक सुरक्षित नहीं रहेगा। अब समय कागजी कार्रवाई का नहीं, बल्कि—तत्काल गिरफ्तारी, अवैध क्रेशरों पर सीधी कार्रवाई, और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है। अन्यथा यह मान लिया जाएगा कि अमरकंटक में संविधान नहीं, बल्कि माफिया का समानांतर शासन चल रहा है।
क्या वर्तमान में भारत सरकार एवं राज्य सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून को पारित क्यों नहीं कर रही है क्या समूचे पत्रकारों को करने के लिए गुंडा पाल रखा है क्या सरकार पत्रकार सरकार का चौथा स्तंभ है और इस चौथा स्तंभ को करने के लिए तुला हुआ है इससे साफ जाहिर होता है कि पत्रकार की गरिमा को पूर्ण रूप से खत्म करने वाली है आज जब अमरकंटक में हो रहा है इस तरह का कहानी मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के बॉर्डर में तो दोनों राज्य के सरकार चूड़ी पहन कर बैठ चुकी है इसलिए कुछ नहीं कर रही है कर रही हो तो केवल गुंडा मावलियों के लिए जनता के लिए नहीं कर रही है शासन में बैठे हुए कर्मचारियों के लिए नहीं कर रही है कर रही है तो केवल गुंडा मावलियों को ही सुरक्षा दे रही है।
इसीलिए कहा जाता है छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में अपराधियों का गढ़ बन चुका है और उन अपराध करने वाले अभियुक्तों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है आजकल जनप्रतिनिधि गुंडा भी का रोल कर रहे हैं।
रिपोर्टर राकेश कुमार साहू जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़ राज्य।





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