Bilaspur High Court News: विभागीय जांच पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, गवाहों के बयान के बिना कार्रवाई अमान्य, रिकवरी आदेश रद्द

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो जांच अधिकारी के लिए गवाहों के बयान दर्ज करना और साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई जांच के आधार पर पारित आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माने जा सकते। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने दिवंगत कर्मचारी के खिलाफ जारी 1.62 लाख रुपये से अधिक की रिकवरी का आदेश और कमिश्नर का अपीलीय आदेश दोनों निरस्त कर दिए।

17 आरोपों के साथ शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई

मामला याचिकाकर्ता आशीष जांगड़े के दिवंगत पिता लीला राम जांगड़े से जुड़ा है, जो दुर्गूकोंदल जनपद पंचायत में ग्राम सहायक के पद पर कार्यरत थे। विभाग ने 23 जून 2003 को उनके खिलाफ 17 आरोपों वाला आरोप पत्र जारी किया था। उन्होंने 14 अगस्त 2003 को अपना जवाब प्रस्तुत करते हुए सभी आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था।

इसके बाद विभाग ने जांच अधिकारी नियुक्त किया। जांच अधिकारी ने 21 अगस्त 2015 को अपनी रिपोर्ट में सभी आरोपों को सिद्ध माना। इसी रिपोर्ट के आधार पर जनपद पंचायत चरामा के तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 16 अक्टूबर 2015 को 1,62,843 रुपये की वसूली का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश के खिलाफ की गई अपील को बस्तर संभाग के कमिश्नर ने 18 जून 2021 को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

सुनवाई का पूरा अवसर नहीं देने का लगाया गया आरोप

मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ए.वी. श्रीधर ने दलील दी कि पूरी विभागीय जांच छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के नियम-7 के विपरीत की गई। उन्होंने कहा कि जब कर्मचारी ने आरोपों से इनकार किया था, तब जांच अधिकारी को गवाहों के बयान दर्ज करने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और कर्मचारी को जिरह व अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

वहीं राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए पैनल अधिवक्ता अमनदीप सिंह ने कहा कि कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस दिया गया था और जवाब देने का पर्याप्त अवसर भी मिला था। दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लिया गया।

हाई कोर्ट ने प्रक्रिया को बताया नियमों के विपरीत

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि विभागीय जांच के दौरान वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि आरोपों से इनकार करने की स्थिति में केवल दस्तावेजों के आधार पर जांच पूरी नहीं की जा सकती, बल्कि गवाहों के बयान और साक्ष्य दर्ज करना आवश्यक होता है।

इसी आधार पर अदालत ने 1,62,843 रुपये की रिकवरी का मूल आदेश और कमिश्नर बस्तर द्वारा पारित अपीलीय आदेश दोनों को रद्द कर दिया।

सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने के निर्देश

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दिवंगत कर्मचारी के सभी लंबित सेवानिवृत्ति लाभ नियमानुसार जारी किए जाएं। अदालत के इस फैसले को विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निर्धारित प्रक्रिया के पालन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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