जरहाभाठा के पॉश इलाके में जमीन घोटाला: 3 डिसमिल खरीदी, दस्तावेजों में हेरफेर कर 6 डिसमिल बेची, 5 महीने बाद भी FIR नहीं। राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप, जांच के बाद खुला मामला, पुलिस पर भी उठ रहे सवाल।

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 बिलासपुर
बिलासपुर के पॉश इलाके जरहाभाठा (ओमनगर) में जमीन से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जहां एक कारोबारी पर राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से दस्तावेजों में हेरफेर कर दोगुनी जमीन बेचने का गंभीर आरोप लगा है।
मामले की शिकायत सिविल लाइंस थाने में की गई है, लेकिन करीब 5 महीने बीत जाने के बाद भी FIR दर्ज नहीं होने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
 क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, आरोपी *
किशोर दयालानी किशोर फूट वियर* ने वर्ष 2009 में खसरा नंबर 54/25 की 3 डिसमिल (लगभग 1295 वर्गफीट) जमीन खरीदी थी।
लेकिन आरोप है कि बाद में राजस्व रिकॉर्ड (खसरा) में छेड़छाड़ कर जमीन का रकबा बढ़ाकर 6 डिसमिल कर दिया गया।
इसके बाद वर्ष 2011 में आरोपी ने दो अलग-अलग व्यक्तियों—रश्मि मोटवानी और अनिल मोटवानी—को 1400-1400 वर्गफीट के दो प्लॉट बेच दिए।
हैरानी की बात यह है कि मौके पर आरोपी के नाम पर अतिरिक्त जमीन मौजूद नहीं थी, इसके बावजूद दस्तावेजों में अधिक रकबा दिखाकर रजिस्ट्री कर दी गई।
  दूसरे खरीददार की जांच में खुला खेल* 
बताया जा रहा है कि जब दूसरे खरीददार ने जमीन के दस्तावेजों की गहन जांच कराई, तब पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।
जांच में सामने आया कि खसरा और अन्य राजस्व रिकॉर्ड में ओवरराइटिंग कर जमीन का रकबा बढ़ाया गया, यहां तक कि कथित रूप से सरकारी जमीन को भी शामिल कर लिया गया।
 दोनों प्लॉट पर बन चुके हैं मकान* 
सूत्रों के अनुसार, जिन दोनों प्लॉट्स की बिक्री की गई थी, वहां अब बहुमंजिला मकान भी बन चुके हैं, जिससे विवाद और जटिल हो गया है।
  टैक्स बचाने के लिए कच्चा-पक्का खेल* 
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि:
जमीन की वास्तविक कीमत ज्यादा होने के बावजूद रजिस्ट्री में कम दर दिखाई गई
बाकी रकम नकद (कच्चे) में ली गई
इससे शासन को राजस्व का नुकसान हुआ राजस्व अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध* 
विशेषज्ञों का मानना है कि खसरा, बी-2 जैसे सरकारी दस्तावेजों में बिना राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत के बदलाव संभव नहीं है।
ऐसे में इस पूरे मामले में पटवारी और अन्य राजस्व अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।मामले की शिकायत करीब 5 महीने पहले की जा चुकी है, लेकिन अब तक FIR दर्ज नहीं हुई है।
सिविल लाइंस पुलिस का कहना है कि तहसीलदार से जानकारी नहीं मिलने के कारण कार्रवाई लंबित है, लेकिन इस देरी को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

 
यह मामला न सिर्फ जमीन घोटाले का है, बल्कि इसमें सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ और राजस्व तंत्र की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
अब देखने वाली बात होगी कि पुलिस कब तक इस मामले में FIR दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करती है।

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