बिलासपुर : 5000 रिश्वत केस में करीब दो दशक बाद बड़ा फैसला सामने आया है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने 2004 के इस मामले में आरोपी को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने सीबीआई कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए साफ कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांग और स्वीकार करने को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
यह मामला कोरिया कोलियरी (एसईसीएल) में कार्यरत कर्मचारी माइकल मसीह की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन पर्सनल मैनेजर जितेन्द्र नाथ मुखर्जी ने पीएफ से 2.5 लाख रुपये की अग्रिम राशि स्वीकृत कराने के बदले ₹5000 रिश्वत मांगी थी। शिकायत के बाद सीबीआई ने 27 फरवरी 2004 को ट्रैप कार्रवाई कर आरोपी को उसके घर से कथित रूप से रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था। इसके आधार पर 2006 में विशेष सीबीआई कोर्ट, रायपुर ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए एक-एक वर्ष की सजा सुनाई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कई खामियां सामने आईं। कोर्ट ने पाया कि रिश्वत मांगने का आरोप केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित था, जिसे स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्टि नहीं मिली। साथ ही, संबंधित सीपीएफ आवेदन का मूल दस्तावेज भी पेश नहीं किया गया। गवाहों के बयान भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे और ट्रैप गवाहों ने केवल पैसे मिलने की बात कही, मांग की नहीं।
₹5000 रिश्वत केस में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल पैसे की बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता। आरोपी ने भी अपने बचाव में कहा था कि उसने रिश्वत नहीं मांगी, बल्कि पैसे जबरन देने की कोशिश की गई थी।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए आगे कोई कार्रवाई आवश्यक नहीं है।
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