बिलासपुर प्रेस क्लब का चुनाव नियम विरुद्ध - दिलीप यादव पूर्व सचिव बिलासपुर प्रेस क्लब

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बिलासपुर - दिलीप यादव पूर्व सचिव बिलासपुर प्रेस क्लब का कहना है कि फर्म एवं संस्थाएं के अफसरों ने प्रेस पर सीधा हमला किया, इस काम में क्लब के दो सदस्य और दो बाहरी लोग शामिल हैं।
दरअसल, अफसरों ने फर्जी शिकायत को ढाल बनाकर बिलासपुर प्रेस क्लब के लोकतांत्रिक चुनाव को कानून ताक पर रखकर रद्द कर दिया।
दस्तावेज बताते है कि फर्म एवं संस्थाएं विभाग के अफसर खुद जज बन बैठे और न्यायपालिका की भूमिका निभाने लगे।

बिलासपुर प्रेस क्लब का कार्यकाल 2023 से 2025 तक था। कार्यकाल खत्म होने से पहले 7 सितंबर 2025 को सामान्य सभा बुलाई गई। आय-व्यय का पूरा ब्योरा रखा गया। सदस्यों ने चुनाव की मांग की और सर्वसम्मति से वरिष्ठ सदस्य महेश तिवारी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया।

9 सितंबर को चुनाव अधिसूचना जारी हुई।
10 सितंबर को दावा-आपत्ति के बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई।
पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई।
मतदाता सूची और चुनाव कार्यक्रम फर्म एवं संस्थाएं कार्यालय में जमा किए गए और पावती भी ली गई।

लेकिन इसके बाद शुरू हुआ खेल।
चार लोगों ने सहायक पंजीयक ज्ञान साहू के पास शिकायत की।
इनमें दो ऐसे लोग थे, जिनका प्रेस क्लब से कोई लेना-देना ही नहीं।
और दो वही लोग थे, जो खुद चुनाव में प्रत्याशी थे, प्रचार भी करते रहे और चुनाव हार भी गए।

छत्तीसगढ़ रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 32 साफ कहती है—
शिकायत तभी मान्य होगी, जब शासी समिति के बहुमत या एक तिहाई सदस्यों के शपथ पत्र के साथ हो।
लेकिन यहां बिना कोरम, बिना शपथ पत्र, अवैध शिकायत पर संज्ञान लिया गया।

इतना ही नहीं…
अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सहायक पंजीयक ने चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी किए।
जबकि कानून साफ कहता है—
चुनाव संपन्न होते ही चुनाव अधिकारी की भूमिका खत्म हो जाती है।
निर्वाचित अध्यक्ष दिलीप यादव को सुनवाई का मौका तक नहीं दिया गया।

इसके बाद 18 नवंबर 2025 को रजिस्ट्रार पद्मिनी भी ने आदेश जारी कर
19 सितंबर को हुए चुनाव को ही अमान्य कर दिया।
जबकि नियम स्पष्ट है—
चुनाव केवल इलेक्शन पिटिशन के जरिए और केवल न्यायालय ही रद्द कर सकता है।

धारा 32 में सिर्फ वित्तीय अनियमितता या प्रशासनिक अव्यवस्था की जांच का अधिकार है।
चुनाव रद्द करने का अधिकार कहीं नहीं लिखा।
फिर सवाल उठता है—
किस अधिकार से चुनाव रद्द किया गया?


यह सिर्फ एक प्रेस क्लब का मामला नहीं…
यह सवाल है लोकतंत्र का,
यह सवाल है प्रेस की स्वतंत्रता का।
अब बड़ा सवाल यही है—
क्या अफसर कानून से ऊपर हो गए हैं?
और किस दबाव में लिया गया यह फैसला?
जवाब अब अदालत में मांगा जाएगा।

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