सूरजपुर/पत्थलगांव: छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार आते ही क्या 'सत्ता के करीबियों' ने अपनों को ही लूटना शुरू कर दिया है? पत्थलगांव से लेकर सूरजपुर तक आज एक ही नाम चर्चा में है- आलोक गर्ग। खुद को भाजपा का कद्दावर नेता और रसूखदार व्यापारी बताने वाले आलोक गर्ग पर अपने ही सगे जीजा के साथ ₹27,85,000 (सवा 27 लाख से अधिक) की धोखाधड़ी का बेहद संगीन आरोप लगा है। यह मामला सिर्फ पैसों की हेराफेरी का नहीं है, बल्कि यह कहानी है सत्ता की हनक, रिश्तों के कत्ल और करोड़ों के सरकारी टेंडर के खेल की।
*भरोसे का 'कत्ल' : साले ने जीजा की पीठ में घोंपा खंजर :*सूरजपुर में 'मे. आशा स्टील' और 'मे. श्याम इंडस्ट्रीज' जैसे प्रतिष्ठित संस्थान चलाने वाले पीड़ित को क्या पता था कि जिस साले पर वह भरोसा कर रहे हैं, वही उनकी गाढ़ी कमाई पर नजर गड़ाए बैठा है। शिकायत के मुताबिक, आलोक गर्ग ने अपनी राजनीतिक पहुंच का ऐसा मायाजाल बुना कि पीड़ित उसमें फंसता चला गया। आलोक ने बड़े गर्व से दावा किया था- "प्रदेश में हमारी सरकार है, जशपुर के दिग्गज मंत्रियों और नेताओं से मेरे सीधे ताल्लुकात हैं, काम की चिंता मत करो।"
*ठगी की इनसाइड स्टोरी: कैसे बुना गया '2 करोड़ का टेंडर' जाल? -*आरोपी आलोक गर्ग ने पीड़ित को शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग में 2 करोड़ रुपये के फर्नीचर सप्लाई का सरकारी टेंडर दिलाने का प्रलोभन दिया। ठगी को तीन चरणों में अंजाम दिया गया :
* व्हाट्सएप पर 'सेटिंग' का खेल: टेंडर पास कराने और बड़े नेताओं को 'मैनेज' करने के नाम पर सबसे पहले 7.85 लाख रुपये झटके गए। इसके पुख्ता सबूत आरोपी के व्हाट्सएप चैट और ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड में मौजूद हैं।
* कर्ज के दलदल में धकेला : ठगी यहीं नहीं रुकी। जशपुर में सप्लाई ऑर्डर का फर्जी भरोसा दिलाकर पीड़ित को मजबूर किया गया कि वह बाजार से कर्ज ले। इसके बाद आरोपी ने 20 लाख रुपये की एक और मोटी रकम डकार ली।
*बड़े नामों की ढाल :* जब पीड़ित ने काम न होने पर पैसे मांगे, तो आलोक गर्ग ने बतौली के हरि गुप्ता नामक व्यक्ति का जिक्र करते हुए कहा कि पैसा ऊपर 'भाजपा के बड़े नेताओं' तक पहुंच चुका है। यह सीधे तौर पर संगठन की छवि को धूमिल करने और पीड़ित को डराने की कोशिश थी।
*सियासी रसूख या 'अवैध वसूली' का अड्डा? -*इस मामले में सबसे विस्फोटक पहलू यह है कि आरोपी ने खुलेआम भाजपा के कद्दावर नेताओं के नाम का इस्तेमाल वसूली के लिए किया। पीड़ित का आरोप है कि आलोक गर्ग ने सत्ता की धौंस दिखाकर उसे चुप रहने पर मजबूर किया। आज हालत यह है कि पीड़ित कर्जदारों के दबाव में है और आरोपी नेता 'सत्ता के संरक्षण' में चैन की नींद सो रहा है।
*पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल: आखिर देरी क्यों?...*सूरजपुर थाना प्रभारी को दी गई लिखित शिकायत के बावजूद, अब तक आरोपी की गिरफ्तारी न होना कई संदेह पैदा करता है।
* क्या सत्ताधारी दल का बिल्ला लगा लेने से अपराधी कानून से ऊपर हो जाता है?
* क्या पुलिस प्रशासन किसी 'अदृश्य फोन कॉल' के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा है?
* क्या एक व्यापारी को न्याय पाने के लिए अब मुख्यमंत्री की चौखट पर दस्तक देनी होगी?
*बड़ी बहस : अपनों ने ही अपनों को लूटा!...*पत्थलगांव की जनता पूछ रही है कि जो व्यक्ति अपने सगे जीजा का नहीं हुआ, वह जनता और संगठन का क्या होगा? यह ठगी भाजपा के उन कार्यकर्ताओं के मुंह पर भी तमाचा है जो ईमानदारी से काम कर रहे हैं, जबकि कुछ 'आलोक गर्ग' जैसे लोग पद और पहुंच का इस्तेमाल कर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।


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