पत्थलगांव, जशपुर।कहते हैं कि इंसान अपनी किस्मत बदल सकता है, लेकिन जशपुर जिले के पत्थलगांव इलाके में एक ऐसे 'हुनरमंद' व्यक्तित्व का उदय हुआ है जो न केवल अपनी जाति बदल सकता है, बल्कि आदिवासियों के लिए बने कड़े कानूनों के बीच जमीनों के दस्तावेजों के साथ ऐसा 'जादू' कर सकता है कि अच्छे-अच्छे पटवारी दांतों तले उंगली दबा लें। स्वतंत्र पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा की एक शिकायत ने नरेश कुमार सिदार (पिता अजब सिंह सिदार) के उस भू-साम्राज्य की पोल खोल दी है, जो पीएमओ (PMO) तक जा पहुंची है।
'गोंड' या 'उरांव'? पहचान का संकट या फायदे का खेल! -दस्तावेजों के मायाजाल में सबसे मजेदार पहलू नरेश कुमार जी की 'जातीय गिरगिट' वाली कला है। ग्राम पालीडीह और पत्थलगांव के अधिकांश कागजों में महोदय को 'गोंड' जनजाति का बताया गया है。 लेकिन जैसे ही आप खसरा नंबर 513/85/ख की फाइल खोलते हैं, नरेश जी का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वे रातों-रात 'उरांव' जनजाति के सदस्य बन जाते हैं。 अब यह प्रशासनिक चूक है या किसी बड़े 'फर्जीवाड़े' की स्क्रिप्ट, इसकी सूक्ष्म जांच की मांग की गई है।
डायवर्जन का ऐसा 'शौक' कि खेती ही भूल गए :नरेश कुमार जी को शायद मिट्टी से फसल उगाने में कम और कंक्रीट के जंगल उगाने में ज्यादा दिलचस्पी है। पत्थलगांव स्थित उनकी जमीनों की लंबी सूची, जैसे खसरा नंबर 513/15/क/5, 513/24/क, 513/24/ख आदि, अब 'धान' की जगह 'व्यापार' उगलने के लिए तैयार हैं。 दस्तावेजों में इन जमीनों को धड़ल्ले से "वाणिज्यिक/परिवर्तित" (Commercial/Converted) दर्ज किया गया है。 सवाल यह है कि आदिवासियों की जमीन के डायवर्जन के लिए जो सख्त नियम बने हैं, क्या वे नरेश जी के मामले में 'छुट्टी' पर थे?
बैंक का असीम प्रेम: 28 अगस्त 2025 का 'लकी' दिन :आमतौर पर बैंक एक आम आदमी को लोन देने के लिए सौ चक्कर लगवाता है, लेकिन HDFC BANK, रायगढ़ नरेश जी पर काफी मेहरबान है। 28 अगस्त 2025 को शायद कोई शुभ मुहूर्त था, क्योंकि इसी दिन नरेश जी ने अपनी अधिकांश 'कमर्शियल' जमीनें बैंक के पास बंधक (Mortgage) रख दी। खसरा नंबर 513/24/ख से लेकर 513/572 तक की जमीनों पर करोड़ों के वित्तीय लेनदेन की आशंका जताई गई है, जिसकी गूंज अब दिल्ली के गलियारों में सुनाई दे रही है।
पालीडीह से पत्थलगांव तक फैला 'खसरा-तंत्र' :शिकायत के अनुसार, यह खेल केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। ग्राम पालीडीह में खसरा नंबर 100, 163/1, 163/2, 528, 554 और 561 में इनका नाम अन्य सह-खातेदारों के साथ चमक रहा है。 वहीं पत्थलगांव में तो इन्होंने जमीनों की पूरी 'सेंचुरी' ही मार दी है。 इतने बड़े पैमाने पर जमीनें खरीदना, उन्हें डायवर्ट करना और फिर बैंक में बंधक रखना, किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात तो नहीं लगती。
प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती :पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा ने इस पूरे मामले को पीएमओ, कमिश्नर, आईजी और एसडीएम के सामने पेश कर दिया है。
मुख्य मांगें एकदम स्पष्ट हैं :
* नामांतरण और डायवर्जन की प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता से जांच हो。
* आदिवासियों की जमीन हड़पने या नियमों के उल्लंघन की सत्यता जांची जाए。
* और सबसे महत्वपूर्ण, नरेश जी आखिर हैं क्या-'गोंड' या 'उरांव'?
अब देखना यह है कि प्रशासन इस 'अजब' कहानी के 'गजब' किरदारों पर कब और कैसी कार्रवाई सुनिश्चित करता है।...

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