रायपुर। छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। बच्चों के लिए किताबें खरीदते समय प्राइवेट स्कूलों द्वारा की जा रही भारी वसूली ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कई पालकों का आरोप है कि शिक्षा के नाम पर अनावश्यक खर्च थोपे जा रहे हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए वे खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
शिक्षा नहीं, कारोबार बन गया स्कूल सिस्टम
प्रदेश में करीब 6800 निजी स्कूल संचालित हैं, जिनमें से सैकड़ों स्कूल केंद्रीय बोर्ड से जुड़े हैं। इन संस्थानों में फीस, किताबें और यूनिफॉर्म के जरिए अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
सरकारी स्कूलों में जहां कक्षा 1 से 12 तक की किताबें मुफ्त दी जाती हैं, वहीं निजी स्कूलों में महंगी निजी प्रकाशनों की किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
NCERT के बजाय महंगी निजी किताबें क्यों
CBSE से जुड़े स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक NCERT की किताबें अनिवार्य हैं, जिनकी कीमत अपेक्षाकृत कम होती है।
इसके बावजूद कई स्कूल 600 से 700 रुपये तक की निजी प्रकाशकों की किताबें थोप रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जब निर्धारित पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हैं, तो महंगी किताबों की अनिवार्यता क्यों बनाई जा रही है।
छोटे बच्चों के नाम पर बड़ी वसूली
नर्सरी और केजी स्तर पर कोई तय सिलेबस नहीं होने के बावजूद छोटे बच्चों के लिए हजारों रुपये के किताब सेट बेचे जा रहे हैं। 3 से 4 साल के बच्चों पर कई किताबों का बोझ डाला जा रहा है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ माना जा रहा है।
क्या कहते हैं नियम
CBSE के दिशा निर्देशों के अनुसार
- कक्षा 1 से 8 तक NCERT या राज्य बोर्ड की किताबों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए
- कक्षा 9 से 12 तक NCERT किताबें अनिवार्य हैं
- स्कूल किसी एक दुकान से किताब खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते
- सभी किताबों की सूची स्कूल वेबसाइट पर सार्वजनिक करना जरूरी है
इसी तरह CGBSE से जुड़े स्कूलों में कक्षा 1 से 10 तक राज्य पाठ्यपुस्तक निगम की किताबें ही मान्य होती हैं।
नियमों के बावजूद मनमानी जारी
नियम साफ होने के बावजूद कई निजी स्कूल महंगी किताबें और यूनिफॉर्म के नाम पर अभिभावकों पर दबाव बना रहे हैं। तय दुकानों से खरीदारी की मजबूरी भी आम शिकायत बन गई है, जो शिक्षा के अधिकार कानून के खिलाफ है।
शिकायत का भी है प्रावधान
यदि कोई स्कूल महंगी निजी किताबें थोपता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो अभिभावक संबंधित बोर्ड और प्रशासन के पास शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
CBSE के संबद्धता उपनियमों में भी इस तरह की मनमानी पर कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है।
बड़ा सवाल, कब लगेगी रोक
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती इस व्यावसायिक प्रवृत्ति ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी स्तर पर नियम और निर्देश जारी होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उनका पालन नहीं हो पा रहा है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अभिभावकों को राहत कब मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
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